Wednesday, 3 May 2017

डॉ.अंकुर पारे द्वारा लिखित पुस्तक-विस्थापित परिवारों का समाजशास्त्रीय अध्ययन' की समीक्षा।

लेखक -डॉ. अंकुर पारे 

देश -भारत 

पुस्तक -विस्थापित परिवारों का समाजशास्त्रीय अध्ययन

भाषा -हिंदी 

प्रकाशक -सनराइज़ पब्लिकेशन, नई दिल्ली (भारत)

प्रकाशन वर्ष -2017 

मीडिया प्रकार -प्रिंट (हार्डबैक)

पृष्ठ संख्या -183 

ISBN-978-93-80966-70-0

मूल्य -रु 800 

परिचय –

डॉ. अंकुर पारे प्रसिद्ध युवा समाजशास्त्री एवं लेखक है | इनके अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में कई महत्वपूर्ण शोध पेपर प्रकाशित हो चुकें है | इनका प्रमुख शोध कार्य विस्थापन, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन पर रहा है |

समीक्षा –

लेखक डॉ. अंकुर पारे ने अपनी पुस्तक “ विस्थापित परिवारों का समाजशास्त्रीय अध्ययन ” में विस्थापन की समस्या का शोधपरक वैज्ञानिक अध्ययन किया है | विस्थापन एक वैश्विक भयावह समस्या है | आर्थिक विकास सभी देशों के लिए अत्यंत आवश्यक है लेकिन विकास परियोजनाओं के सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभाव भी उभर कर सामने आतें है | विकास के कारण विस्थापन अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय समस्या के रूप में उभरा है | वैश्विक स्तर पर जहाँ लैबनान, सीरिया, सुडान, घाना, इंडोनेशिया एवं भारत में टिहरी परियोजना उत्तराखंड, बिसलपुर परियोजना हिमाचल प्रदेश, सरदार सरोवर परियोजना गुजरात, कुडनकुलम परियोजना तमिलनाडु, नर्मदा परियोजना मध्यप्रदेश आदि के कारण जो विस्थापन की पीड़ा सामने आई है उसको दूर करने एवं विकास परियोजनाओं का सही क्रियान्वयन हो सके, इस पुस्तक में व्यवहारिक शोधपरक व्याख्या की गई है |

संस्करण –

भारत के प्रमुख सनराइज़ प्रकाशन, नई दिल्ली (भारत) ISBN 978-93-80966-70-0 द्वारा लेखक डॉ. अंकुर पारे की पुस्तक “ विस्थापित परिवारों का समाजशास्त्रीय अध्ययन ” वर्ष 2017 में प्रकाशित की गई |

निष्कर्ष –

समाजशास्त्री डॉ. अंकुर पारे ने विस्थापन के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं राजनीतिक प्रभावों का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन किया है | उन्होंने “ न्यूनतम विस्थापन एवं अधिकतम पुनर्वास ” के पालन का सुझाव दिया है |

Thursday, 27 April 2017

किताबों की ज़रूरत है...

ज़िन्दगी की परिभाषा हर किसी के लिए अलग हो सकती है किसी के लिये शायद कुछ सरल हो तो किसी के लिये कठिन,सबके लिये समान हो ये मुश्किल है पर सबके लिये बेहतर तो बनाई जा सकती है।हम सब जानते है।हमारे देश में एक बड़ा तबका आज भी गरीबी रेखा के नीचे अपना जीवन गुजर-बसर करने वालो का है।गरीबी के कई कारण हो सकते है  पर आज विश्विद्यालय के पास दो तीन गरीब बच्चों से हुई बातचीत ने देश के इस अभिषाप के मूल कारण के बारे में सोचने के लिये प्रेरित किया,दरअसल ये बच्चे एक चबूतरे पर थोड़ी सी इमली और कुछ कैरीयां
लिये उन्हें बेचने बेठे थे,उम्र होगी 5 से 8 साल जो सामान बेच रहे थे उसकी कीमत का भी उन्हें अंदाज़ा ना था फिर भी मैने पूछा जो पैसे मिलेंगे इनसे उनका क्या करोगे उत्तर मिला की खाना पकायेंगे।स्कूल के बारे में पूछा तो बताया की हां, जाते हे और किताबो की बात की तो बच्चों ने कहा की 1,2,3 और बाराखड़ी की किताबे चाहिये हे,तब मुझे लगा की अगर इन्हें ये किताबे मिल जाये तो शायद इनका भविष्य इनके वर्तमान की तरह अन्धकारमय नही होगा।
इस सब के बीच  एक बात समझ आई की देश में गरीबी का मुख्य कारण अशिक्षा ही है।
विगत सरकरों से लेकर अबतक की सरकारों ने गरीबी को हटाने के लिये अपने स्तर पर काफी प्रयास किये,योजनाये बनाई परंतु जानकारी के अभाव और अशिक्षा के चलते एक बड़ा तबका इन व्यवस्थाओ का लाभ लेने से वंचित रह गया,अशिक्षा की समस्या सिर्फ गरीबी तक  सीमित नही है,इसके और भी दुष्परिणाम हमारे सामने हे जिनमे मुख्य हे बढ़ती अपराधिक मानसिकता शिक्षा और वैभव के अभाव में व्यक्ति कई बार ना चाहते हुए भी अपराधो की दुनिया में प्रवेश कर लेता है।
हमारे लिये बड़ी विडम्बना यह भी है की जहां एक और हम मंगल तक पहुंच गये हें,विज्ञान से लेकर खेल की दुनिया तक हमने कई कीर्तिमान स्थापित किये परंतु वही दूसरी तरफ हमारे ही  देश में कुछ मासूम हाथो तक अबतक किताबे नही पहुँच पायी है।
शिक्षा ही एक माध्यम है जिससे हम गरीबी को मिटा सकते हें,देश की एक और पीढ़ी गरीब बड़ी हो उससे पहले  ज़रूरत हे सार्थक प्रयासों की जिससे हम अपने देश के भविष्य को अशिक्षा के  अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर लेकर जाये ताकि भारत के उज्ज्वल भविष्य की मजबूत नीव तैयार हो सके,इसकी ज़िम्मेदारी सिर्फ सरकार की नही हम सबकी है।

वासु चौरे

Sunday, 29 January 2017

An Effort

"भागीदारी करो तो किसी के दुःख में करो
सुख में तो साझेदार बहुत होते हे"

कोई किसी के जीवन में बदलाव लाता हे तो कोई समाज में...जब पत्रकारिता की पढाई शुरू करी थी तो सबसे शुरुआती सबको में यह समझ लिया था की पत्रकारिता समाज और देश हित में ही करनी हे,अब पत्रकारिता की पढ़ाई आधी पूर्ण हो चुकी हे और सही वक़्त आ गया हे उन बातो को अमल में लाने का जो बाते अब तक पढ़ी,सुनी,सीखी और समझी हे।

दोस्तो, मदद की ज़रूरत किसे नही होती एक छात्र को शिक्षक की,बच्चे को मता-पिता की...हमे अपने पड़ोसी की मदद की ज़रूरत भी अक्सर पड़ती ही रहती हे कुछ इसी तरह हमारे समाज में रहने वाले एक तबके को हमारी मदद की ज़रूरत हे...वो समाज का शायद सबसे पिछड़ा हुआ तबका हे और हम जिस वर्ग की   बात रहे हे वो वर्ग उस तबके में भी सबसे पिछड़ा वर्ग हे ...हालात हाथो से खराब किये हुए नही हे,प्रकृति के नियम ही निराले हे।

ज़्यादा लंबा लिखने का मतलब हे अपनी रीडरशिप को तलवार की धार पर रखना तो अब सीधे विषय पर बात करता हूँ...

हम बात कर रहे हे उन लड़कियों की जो अपनी मज़बूरी,लाचारी के कारण इस युग में पीछे रह गयी हे...यह दर्द उन महिलाओं का हे जो Loreal,Garnier,Ponds age miracle,fair and lovely  और ना जाने क्या क्या...iconic eyes... पर यह उनकी दास्तां हे  जिनकी आँखों में अँधेरा हे जो इन सबसे कोसो दूर हे जिनकी ज़िन्दगी हर रोज़ एक नई जंग हे ..में जानता हूँ ये ब्यूटी प्रोडक्ट्स रोटी,कपड़ा,मकान की तरह मूल ज़रूरत नही हे पर पीरियड्स के दिनों में एक महिला के लिये सैनेटरी पैड्स ज़रूर एक मूलभूत आवश्यकता हे।

जागरूकता,धन,शिक्षा के अभाव में बहुत सी महिलाये अब तक इस मूलभूत सुविधा से वंचित हे...पहले ही अपनी ज़िन्दगी की जंग लड़ रही इस आधी आबादी के लिए महीने के कठिन दिन ना जाने और कितने कठिन हो जाते होंगे समझ पाना हमारे बस की बात नही।

ऊपर वाले ने अगर हमें किसी और से ज़्यादा दिया हे तो हमारा यह फ़र्ज़ बनता हे की हम उसे उनके साथ बांटे जिन्हें ज़रूरत हे..मुझे गर्व हे की इस बात को हमारे ग्रुप ने बखूबी समझा और महिमा तारे आंटी की प्रेरणा से ज़रूरतमंद महिलाओं तक सैनेटरी पैड्स जैसी मूलभूत सुविधा पहुँचाने का निश्चय किया।

इस विषय पर सोचना और काम करना ज़ाहिर सी बात हे कोई आम काम नही हे पर पत्रकारिता के छेत्र में आना और सीधे समाज से जुड़कर काम करना भी खास हे..खास काम में खासी दिक्कते अक्सर आती ही हे और शायद उन दिक्कतों का सामना हमे भी करना पड़े पर आपके साथ से ज़रूर राहे आसान हो सकती हे।

आइये हम सब भी महिला सशक्तिकरण,स्वच्छ भारत-स्वस्थ भारत की पूरक,इस अनूठी पहल में अपनी सहभागिता दे।

#HopeProductionInitiative
#boldStep
#VasuChourey

Saturday, 7 January 2017

'विधी'

लिखने को तो अक्सर ज़हन में बहुत कुछ होता हे पर जब कोई बात गहराई से दिल को छू जाती हे तो लिखना ही पड़ता हे आंसुओ,से बेहतर हे अल्फ़ाज़ बेह जाये...

आज भी कुछ ऐसा ही हुआ ज़िन्दगी में पहली बार स्पोर्ट्स बीट कवर कर में अजय सर,अभिषेक सर ऑफिस वापस आ रहे थे।रास्ते में अजय सर ने बोला विधी को देखने नही गये अपन,में  अबतक इस नाम से परिचित नही था तो मेने अजय भैया से पूछा की भैया ये विधि कौन हे? विधी छोटी सी 15 साल की बच्ची का नाम हे,प्यारी सी मुस्कान,चेहरे पर इतनी मासूमियत की चांद भी क्या प्यारा लगे विधी के सामने,बातो में घुली हुई गन्ने के रस सी मिठास और आँखे...आँखे मनो उनमे कई झीलो की गहराई समाई हो ...अब में विधी के सामने हॉस्पिटल में उसके बेड के पास बेठा हुआ बस उसे देखे जा रहा था...ईश्वर से मन ही मन सवाल कर रहा था की आप इतनी सी बच्ची को इतनी तकलीफ में कैसे रख सकते हे?दर्द की इन्तेहा क्या हे? पर कहीं से कोई जवाब  नही मिला...अजय भैया ..वो कोशिश कर रहे थे भरपूर कोशिश की बस विधी के चेहरे पर मुस्कान जो मुझे कोहिनूर से कीमती लगी बनी रहे...उन्होंने कल ही विधी को मुख्यमंत्री राहत कोष से सहायता उपलब्ध कराई थी। मुझ से  भी जितना हो सका विधी को खुश करने की कोशिश करता रहा...विधी तुम ना अगले हफ्ते तक दौड़ लगाने लगोगी,देखो तुम कितना जल्दी चलने लगी हो...हे ना? ठीक हो कर ऑफिस ज़रूर आना और बॉस की चेयर पर बैठकर सबको ऑडर देना....विधी तुम जल्दी से ठीक हो जाओ बस...दोस्तों कभी किसी और का दर्द देखकर समझ आता हे की हमारी ज़िन्दगी कितनी बेहतर हे...और ईश्वर ने हमे बेहतर ज़िन्दगी दी हे तो ये उनका इशारा हे की हम उन लोगो की हर मुमकिन मदद करे जिन्हें ज़रूरत हे..किसी का दर्द हमसे ज़्यादा हे तो हमारा फ़र्ज़ हे की हम उसे बाँट ले...कभी लगता हे की हम दुनिया में सबसे ज़्यादा खुशनसीब लोगो में से हे जो खुद उठकर चल तो सकते हे...पर आज मेने करीब से देखा की दर्द की इंतेहा क्या हे...
विधी जल्दी से दौड़ने लगे और में फिर कुछ लिख सकूँ विधी के लिये...आप भी दुआ करना की विधी जल्दी ठीक हो जाये...विधी फिर अपने घुटनो पर खड़ी हो  बिना किसी दर्द के....विधी को गेट वेल सून कहकर हम सब कैंसर हॉस्पिटल से ऑफिस की तरफ चल दीये...मन में अब भी बहुत कुछ चला रहा था..अब भी चल रहा हे...वक़्त कितने इंतेहा ले सकता हे नही पता पर एक विश्वास हे रात किनती भी अंधेरी हो सूरज का निकलना तय हे...

Sunday, 11 December 2016

मील के पत्थर से ज़्यादा कुछ नही मंज़िले,रास्ते आवाज़ देते हे सफर जारी रखो

12062 जबलपुर-हबीबगंज जनशताब्दी एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय से 15 मिनिट देरी से चल रही हे आपको हुई असुविधा के लिए हमे खेद हे... 3 दिन करेली में बिताकर कल रात को बैग जमाते हुए कुछ और यादे भी बेग में ठूस ली,रोहित भैया की शादी में नरसिंहपुर और गाडरवारा के साथियो से मुलाकत,लगभग 3 साल बाद संस्कारधानी में शॉपिंग साथ ही  जबलपुर की हैदराबादी बिरयानी।घर आओ तो शाम का इंतज़ार बेसब्री से रहता हे, और हो भी क्यों ना शाम का समय ही तो होता हे जब दो बेहद अज़ीज़ मित्रो से मुलाक़ात होती हे असफाक और  समीर,सालो से चली आ रही दोनों की आपसी नोकझोंक मे कब लाल सूरज ढल जाता हे और  चाँद अपनी चांदनी समेटे हुए निकाल आता हे पता ही नही चलता और इसी बीच आग में घी डालने के लिए हमारे अंचल भाई हो तो समझ लीजिये सोने पर प्लैटिनम।मलखान के चाय के टपरे पर ठंडी लोहे की बेंच पर बैठकर गरमा-गर्म चाय का मज़ा ही कुछ और होता हे चाय की हर चुस्की के साथ किसी ना किसी दोस्त की याद जुडी हुई होती हे जो मुस्कान बनकर चेहरे पर खिल उठती हे,चाय के बाद नेमा जी की मंगोड़ी,और सार्थक के घर गपशप ट्रेन में आँख बन्द करते ही याद आने लगती हे।
                                  यह सब बहुत सुखद अनुभवो की मीठी यादे हे जो ज़िन्दगी के सेविंग्स एकाउंट में फिक्स डिपाजिट होती जाती हे पर सच्चाई यही हे कही पहुँचने के लिए कही से निकलना पड़ता हे...एक बार फिर जन्म भूमि से कर्म भूमि की ओर,कुछ हासिल करने और  मन में इस भरोसे के साथ की जब अगली बार सब दोस्त मलखान पर  साथ बैठेंगे तो सबके पास अपनी नयी कामयाबियों के ढेरो किस्से होंगे सुनाने के लिये। राह के पत्थर से ज़्यादा कुछ नही मंज़िले,रास्ते आवाज़ देते हे सफर जारी रखो...

मिलते हे :)

Friday, 6 May 2016

मुझे संघर्ष से प्यार हे

कभी धूप हे,कभी छाँव हे
मुझे संघर्ष से प्यार हे

कभी अविरल धार हे
कहीं पत्थरों से टकराव हे

पड़ाव पड़ाव राह में दरार हे
मुझे हर चुनोति स्वीकार हे

मुझे संघर्ष से प्यार हे...

दरिया में उतरा हूँ सामने सैलाब हे
फ़िक्र नही डूबने की मुझे खुद पर विश्वास हे

जंग लग गई हथियारों में
मेरी कलम में धार हे

मुझे संघर्ष से प्यार हे...

गली गली मचा शोर हे हार का
मुझे जीत का इन्तजार हे

सुखी पड़ी हे धरा वीरों की
यहां बारिश की दरकरार हे

मुझे संघर्ष से प्यार हे...

ख़्वाब टुटा था रात के अंधेरो में कहीं
ये आँख अब तक लाल हे

लालिमा छाई हे नयी नयी
पूरी सुबह होने का इंतज़ार हे

मुझे संघर्ष से प्यार हे...

मंज़िल दूर हे आँखों से
मुझे रास्तो पर ऐतबार हे

रुकुंगा नही छितिज तक में
मेरी ज़िद ही चुनोतियों की हार हे

मुझे संघर्ष से प्यार हे...
मुझे संघर्ष से प्यार हे...

#VCवासु

Thursday, 11 February 2016

सीख पिता की...(कविता)

ये कहकर घर से भेजा पापा ने
घर से जा रहे हो बेटा दूर
उम्मीदें हे लाखो तुमसे
हो सबकी आँखों का नूर तुम

ख्वाब बड़े हे,दिखते तुम्हारी आँखों में
होने ना देना इन्हें चूर तुम
मंज़िल हे तुम्हारी हे,सफर तुम्हारा बेटा...

चलते चलते थक जाओ राह में
तो कर लेना थोड़ा आराम तुम
उठकर फिर से चलने लगना
रास्ते में ही न रुक जाना तुम..

छलांग लगाने की कोशिश में
गिरोगे दस बार बेटा..
धीरे धीरे कदम बढ़ाना
कोई छोटा रास्ता ना अपनाना तुम..

ये दुनिया हे,होता कुछ भी ना असां यहां
पर जारी रखना प्रयास तुम
नामुमकिन भी हे होता मुमकिन
खुद पर रखना यकीन तुम...

श्री कृष्ण तुम्ही हो
और अर्जुन भी तुम तुम्हारे ...
हो सवार सफलता के रथ पर
दूर शिखर तक जाना तुम..

बाते करते हो बड़ी बड़ी
कुछ करके भी दिखाना तुम...

#VCवासु

Friday, 11 December 2015

आप के आम लाखो के

एक योग्य और शिक्षित व्यक्ति को देश में बमुश्किल 30 से 40 हज़ार की नोकरी और 3,4 हज़ार रुपय तक का अन्य भत्ता मिल पाता हे लेकिन अगर आप दिल्ली में विधायक बनने की तैयारी कर रहे हे तो फिर आपको फ़िक्र करने की कोई ज़रूरत नही हे।इस समय अपनी इवन और ओड नंबर वाली ट्रैफिक व्यवस्था को लेकर पुरे देशभर के मीडिया में छाये दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने बड़ी ही चतुराई से विधयाको को मिलने वाली तन्खा और भत्ते में सीधे 400 प्रतिशत का इजाफा कर दिया हे अब अगर आप दिल्ली विधायकों की वेतन और भत्ते को जोड़कर देखते हे तो उनकी प्रतिमाह तन्खा होती हे 2 लाख 35 हज़ार रुपय प्रतिमाह जो देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से कहीँ ज़्यादा हे। क्रमशः प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को प्रतिमाह 1 लाख 60 हज़ार रूपय और 1 लाख 50 हज़ार रूपय मिलते हे। अब आप ही बताइये हो गये ना आप के आम लाखो के , देश में राजनीत का तमाशा तो देखिये गरीबो को कड़ाके की ठण्ड में सोने के लिये छत नही मिलती और नेताओ को फर्नीचर के नाम पर लाखो रुपय मिल रहे हे।

वासु चौरे
एम.सी.यू
भोपाल

पढ़े लिखे,चुनाव लड़े

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा की खट्टर सरकार की पंचायती चुनाव अधिनियम में संसोधन की मांग वाली याचिका के पक्ष में सुनवाई करते हुए चुनाव नियमो में फेरबदल करने की अनुमति दे दी हे जिसके तहत अब हरियाणा में पंचयात चुनाव लड़ने के लिये शैक्षणिक योग्यता निर्धारित की जा सकेगी। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सच में स्वागत योग्य भी हे क्योंकि जब देश में एक निचले दर्जे की नोकरी के लिये भी शैक्षणिक योग्यता निर्धारित हे तो नेता बनने के लिये क्यों नही? आई.आई.टी. , आई.पी.एस.सी. , यू.पी.एस.सी. जैसी कई कठिन परीक्षाओ को पास कर और आरक्षण के मकड़ जाल से दो चार होते हुए छात्र किसी पद पर पहुँच पाते हे लेकिन जनाब जरा उसी देश की विडम्बना तो देखिये आज़ादी के साठ साल बाद भी देश के बड़े बड़े राजनेतिक पदों पर पहुचने के लिये कोई भी शैक्षणिक योग्यता तय नही की गयी हे। राजनीत में आने और नेता बनने के लिये आपको किसी भी प्रकार की डिग्री की कोई अवस्यक्ता नही हे, पर हां बाशर्ते आपके पास धनबल और बाहुबल होना चाहिये तभी तो देश में पांचवी फ़ैल विधायक सांसद बन जाते हे,नोवि फ़ैल डिप्टी सी.एम. और अगर आप बारव्ही में फ़ैल भी हे तो भी आप 125 करोड़ से ज़्यादा आबादी वाले देश के मानव संसाधन विकास मंत्री तो बन ही सकते हे। अब आप इसे लोकतंत्र कहे या राजनीत लेकिन शैक्षणिक योग्यता तय ना होने के कारण कई काबिल लोग इन अनपढ़ नेताओ से पीछे रह जाते हे और आयोग्य हाथो में देश भी सही विकास नही कर सकता। राजनीती से सरकार बनती हे और सरकार देश चलाती हे इसलिये ज़रूरी हे की चुनाव लड़ने के लिये प्रत्याशियो का शैक्षणिक स्तर निर्धारित किया जाये ताकि योग्य व्यक्ति सरकार का हिस्सा बन सके।

वासु चौरे

एम.सी.यू
भोपाल

Thursday, 10 December 2015

कटघरे में अदालत

आखिरकार 13 साल पुराने हिट एन्ड रन मामले में गुरूवार को सलमान खान बाइज्जत बरी तो हो गये लेकिन इस फैसले ने अदालत को ही कटघरे में ला खड़ा कर दिया हे।भारत में न्यायिक व्यवस्था आज एक बार फिर से सवालों के घेरे में हे।अदालत को सलमान शराब पीकर गाड़ी चला रहे थे या नही ? ये फैसला करने में 13 साल का वक्त कैसे लग गया ? इसी मामले में सलमान खान को सेशन कोर्ट 5 साल की सजा भी सुना चुका था। कोर्ट की माने तो विपक्ष सलमान पर लगाये आरोपो को सिद्ध करने में 13 साल बाद भी विफल रहा। फैसले के बाद देश का राजनेतिक माहौल भी गरमा गया और सोशल मीडिया पर तीखी टिप्पड़ियां आना शुरू हो गयी जैसे सलमान ने कोर्ट को मुक्त कर दिया,अगर आप मेहंगा वकील रख सकते हे तो केस आप ही जीतेंगे,शराब सलमान ने नही कार ने पी रखी थी। ये पूरा मामला भी सलमान की किसी धमाकेदार फ़िल्म की तरह मीडिया पर छाया रहा। खैर  न्यायपालिका के निर्णय का सम्मान करना हर भारतीय का कर्तव्य हे फिर भले ही अदालत खुद कटघरे में क्यों ना हो।

वासु चौरे
एम.सी.यू
भोपाल

पाक से समग्र बातचीत

पाकिस्तान के साथ समझोते और बातचीत के सिलसिले तो सालो से चले आ रहे हे लेकिन हर बार नतीजा वही ढाक के तीन पात। इस बार भी एशियन समिट के बहाने भारत की की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पाक के दौरे पर हे इस दौरे को लेकर देश में पहले ही राजनेतिक पारा चढ़ा हुआ हे।सुषमा जी जब पाक के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ और विदेश मंत्री सरताज अज़ीज से मिलकर वापस लौटेंगी तो वर्षो से चली आ रही बहस एक बार फिर से गरमा जायेगी फिर चाहे बात करे आतंकवाद की,कश्मीर की या शीज फायर उलन्घन की हर बार  भरोसे के बदले भारत के हाथ धोका और निराशा ही लगी हे।सवाल ये भी उठता हे की  कश्मीर में  और सीमा पर हालात अब भी गंभीर बने हुए हे लेकिन फिर भी सरकार अपने बयान से पलटकर पाक से बातचीत क्यों करना चाहती हे?पाक को आड़े हाथो लेने की बात करने वाली सरकार यू टर्न लेकर पाक से वार्ता करने के लिये बेताब नज़र आ रही हे इससे  भा.ज.पा. के साथ उसके सहयोगी दल शिवसेना की भूमिका पर भी सवाल उठना लाज़मी हे। इसी प्रकार 1998 में अटल जी ने भी कॉम्पोजिट डॉयेलाग की शुरुआत करी थी जिसका अंत 2008 मुम्बई हमलो के बाद हुआ। पाक के साथ समग्र बातचीत में समग्र सावधानी बरतना भी  ज़रूरी हे  क्योंकि ज़ख्मो को हरा होने में वक़्त नही लगता।

वासु चौरे
एम.सी.यू
भोपाल

Tuesday, 1 December 2015

A blog on his 7th bday


प्यारे भाई

सुना हे जब Telephone,Mobile,Internet, SMS,FaceBook,What's app ये  सब नही हुआ करते थे उस समय लोग अपने प्रिय जनो को चिट्ठियां लिखा करते थे,चिट्ठियों को अपने पाठको के पास पहुचने में हफ्ते हफ्ते भर तक का समय लग जाता...बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार होता था इन पत्रो का और फिर चिट्ठी भेजने वाला लंबे समय तक अपने पत्र के जवाब का इंतज़ार करता रहता।डाकिया बाबू की साइकिल अगर घर के सामने रुक गयी तो समझलो की घर में खुशिया आयी हे।उस टाइम लोग ज़्यादा पढ़े लिखे भी नही थे तो,डाकिया बाबू खुद ही चिट्ठी को पढ़कर सूनाया करते थे..लोगो में अपनापन था चिट्ठियों के लिफ़ाफ़े खोलने के लिए किसी Password या Pattern lock की ज़रूरत नही पड़ती थी..खेर ये टाइम तो मेने भी नही देखा बस बड़ो से सुना हे तो आज तुम्हे बता रहा हूँ,और मुझे माफ़ करना भाई पत्र लिखने की पौराणिक  परंपरा को तोड़ने में कुछ या बहुत कुछ योगदान हमारी पीढ़ी का भी हे तभी तो आज तुम्हारे जन्मदिन पर तुम्हे पत्र की जगह ब्लॉग लिख रहा हूँ ये जानते हुए भी की शायद तुम इसे सात साल की उम्र में पढ़ भी नही पाओगे पर आशा हे की कोई ना कोई तुम्हे पढ़कर सुना देगा पर तुम समझ नही पाओगे कोई बात नही..ये ब्लॉग तुम बड़े हो जाओगे,समझने लगोगे तो एक बार फिर से पढ़ना।

2 दिसंबर 2008
जब तुम्हारा जन्म हुआ तो में भोपाल के LBS होस्पिटल में तुम्हें देखने के लिए वहां पर नही था और अगले एक महीने भी मुझे तुम्हारे  दर्शन नही हुए पर सुना था की तुम बिल्कुल छोटे से चूहे की तरह थे..हम सब तुम्हे झूला झुलाते, गोदी में बहुत ध्यान से, सम्भलकर तुम्हे उठाते और यहां वहा घुमाते..देखते ही देखते तुम घुटनो पर चलने लगे अब तुम खुद ही पुरे घर की सैर पर निकल पड़ते और कभी दीवान के नीचे तो कभी पलंग के नीचे मिलते ..एक दिन तुम्हे पहली बार खुद के पेरो पर खड़ा होते हुए देखा उसके लिए तुम्हे बहुत मेहनत करनी पड़ीं थी और तुम खड़े होने के बाद भी कई बार बैलेंस नही बना पाये और गिर गये..तुम्हे चोट भी लगी,रोये भी लेकिन तुमने हार नही मानी जितनी बार गिरे उतनी ही बार तुमने दोबारा कोशिश करी और फिर बिना किसी सहारे के अपने पेरो पर खड़े हो गये..अब तुमने कदम बढ़ाने  चाहे तो फिर से कई बार गिरे लेकिन कोशिश करना नही छोड़ा..देखते ही देखते चलना क्या तुम दौड़ना सीख गये और फिर हम सब लोग तुम्हे दोडता हुआ देख तुम्हारे पीछे दौड़ने लगे..आज तुम ये ब्लॉग(letter)खुद से पढ़ रहे हो तो समझने की कोशिश करना की बचपन में अगर बार बार गिरने के बाद खड़े होने की कोशिश करना ही बन्द कर दिया होता तो क्या आज दौड़ पाते??
इसी तरह ज़िन्दगी में भी बहुत सी परेशानियां आती हे,हमे कई बार गिरना भी पड़ता हे,निराशा हाथ लगती हे लेकिन हमेशा उठने की कोशिश करते रहना चाहिए क्योंकि एक बार हम उठ खड़े हुए तो फिर हमे दौड़ने से कोई नही रोक सकता..हमेशा लोग पीछे ही  भागेंगे।

Wishing u a very very happy birthday bhai wid tons of love n lots of wishes,God bless u,stay healthy,happy and blessed..

Yours
Vasu

Friday, 27 November 2015

अनाथालय फरिश्तों का घर

हर बच्चा भगवान का रूप होता हे पर भगवान ने जेल में भी जन्म लिया हे और महल में भी..ऐसे ही हर बच्चे की यादो में घर में गुज़रे बचपन की मधुर यादे नही होती कुछ की यादो में  बचपन घर के आंगन में नही अनाथालय के मैदान में  होता हे। हम तो वो खुशनसीब हे जिन्हें माँ का आँचल सोने के लिए और घूमने के लिए पिता का कन्धा मिला,हमारी ज़रूरते जवान पर आने के पहले ही पूरी हो जाती रही..हमे किसी ने चलना सिखाया ऊँगली पकड़कर वो खुद ही चलना सीख गये हे गिरकर,लड़खड़ाकर।में बात कर रहा हूँ उनकी जो दुनिया में आते ही अकेले पड़ गये 'अनाथ' ।

बात कुछ दिन पुरानी हे,मेरे स्व. नाना जी जो अपने आप में एक आदर्श थे उनकी स्मृति में भोज का आयोजन रखा गया था,में भी वहां उपस्थित था।सुबह से दोपहर  में देर तक भोज चलता रहा दिनभर की भागदौड़ के बाद थककर एक कुर्सी पर शरण ली ही थी की मामी जी ने एक और फरमान जारी कर दिया, खाने के पैकेट्स बनाकर गरीबो और अनाथालय में रहने वाले  बच्चों को  पहुचना था।एक बार फिर में और मेरे सभी बड़े भाई बहन पैकेट्स बनाने में जुट गये।शानदार पैकिंग का आईडिया जीजू का था और पैकिंग करने में हमारा मार्गदर्शन मामी एवम् मौसी जी ने किया आधे घण्टे बाद ही लगभग 60,70 खाने के पैकेट्स तैयार थे।पैजेट्स लेकर हम एक अनाथालय के बाहर पहुंचे तो हमारा स्वागत किया एक स्वर में आ रही छोटे छोटे बच्चों की प्यारी आवाज़ ने  दो एकम दो,दो दुनी चार....
कदम अंदर की और बढे तो एक हॉल के झरोखे से
नन्हे मुन्नों को पढ़ते हुआ देखा कदम वहीँ रुक गये,जीजू और भैया संचालक महोदय से मिलने आगे निकल चुके थे पर में वही खड़े खड़े उन मासूमो को निहार रहा था..उन्हें देखकर अपने बचपन की याद आ रही थी जो उनके जैसा बिल्कुल नही था..वो अपने घर पर नही अनाथालय में थे पर  फिर भी वो कितने खुश दिख रहे थे..उनके चेहरे पर हंस रही मासूमियत और दिल की सच्चाई का सबूत देती उनकी आँखों की चमक ने मुझे ये सोचने पर मजबूर कर दिया की हर खाव्हिश हमारी पूरी हो जाती हे पर फिर भी चेहरे पर वो सच्ची मुस्कान नही आ पाती,उनके कपडे पुराने थे,मेले फटे थे पर में ब्रांडेड कपड़ो में भी खुद को उनसे ज़्यादा अच्छा नही लग रहा था शायद उनका दिल मुझसे कहीँ ज़्यादा खूबसूरत था।मेरे पास हर वो चीज़ होगी जिसे वो अपना बनाने का सोच भी नही पाते होंगे पर संतुष्टि मुझे उनके चेहरे पर दिखी ...मुझे तो अभी भी बहुत कुछ चाहिये ना..किसी काम से उनकी शिक्षिका हॉल से बाहर निकली तो में खुद को अंदर जाने से रोक नही पाया।मुझे देखकर उनकी वो प्यारी मुस्कान एक इंच और बढ़ गयी शायद समझ गए होंगे की में उनके लिये
कुछ ले कर आया हूँ।उन्होंने हाथ जोड़कर मेरा अभिवादन किया जिसके में लायक भी नही...तो आँखे भर आयी मेने भी अपने दोनों हाथ जोड़लिये पर मुंह से चाहते हुए भी एक शब्द नही निकला..एक बात जिसने मुझे काफी प्रभावित किया वो थी उनका अनुसासन टीचर की अनुपस्थिति में भी वो अपना काम उसी स्वर में लगातार कर रहे थे..हॉल अब भी दो एकम दो,दो दुनी चार की आवाज़ से गूंज रहा था..और में उन्हें अब और करीब से निहार रहा था..उनसे खुद की तुलना कर रहा था और खुद को उनसे भी छोटा महसूस कर रहा था..भरी हुई आँखों से पहला आंसु गिरने ही वाला था की पीछे से भैया की आवाज़ आयी वासु चलो..बिना पीछे मुड़े ही आगे बढ़ गया....दोस्तों ये अनाथ नही फ़रिश्ते हे और अनाथालय घर हे फरिश्तों का।एक बात मन में आयी  की अगली बार जब यहां आऊंगा तो पूरी टीम के साथ इन बच्चों पर एक शार्ट फ़िल्म बनाने ..आप भी चलेंगे ना..?