पाकिस्तान के साथ समझोते और बातचीत के सिलसिले तो सालो से चले आ रहे हे लेकिन हर बार नतीजा वही ढाक के तीन पात। इस बार भी एशियन समिट के बहाने भारत की की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पाक के दौरे पर हे इस दौरे को लेकर देश में पहले ही राजनेतिक पारा चढ़ा हुआ हे।सुषमा जी जब पाक के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ और विदेश मंत्री सरताज अज़ीज से मिलकर वापस लौटेंगी तो वर्षो से चली आ रही बहस एक बार फिर से गरमा जायेगी फिर चाहे बात करे आतंकवाद की,कश्मीर की या शीज फायर उलन्घन की हर बार भरोसे के बदले भारत के हाथ धोका और निराशा ही लगी हे।सवाल ये भी उठता हे की कश्मीर में और सीमा पर हालात अब भी गंभीर बने हुए हे लेकिन फिर भी सरकार अपने बयान से पलटकर पाक से बातचीत क्यों करना चाहती हे?पाक को आड़े हाथो लेने की बात करने वाली सरकार यू टर्न लेकर पाक से वार्ता करने के लिये बेताब नज़र आ रही हे इससे भा.ज.पा. के साथ उसके सहयोगी दल शिवसेना की भूमिका पर भी सवाल उठना लाज़मी हे। इसी प्रकार 1998 में अटल जी ने भी कॉम्पोजिट डॉयेलाग की शुरुआत करी थी जिसका अंत 2008 मुम्बई हमलो के बाद हुआ। पाक के साथ समग्र बातचीत में समग्र सावधानी बरतना भी ज़रूरी हे क्योंकि ज़ख्मो को हरा होने में वक़्त नही लगता।
वासु चौरे
एम.सी.यू
भोपाल
No comments:
Post a Comment