लिखने को तो अक्सर ज़हन में बहुत कुछ होता हे पर जब कोई बात गहराई से दिल को छू जाती हे तो लिखना ही पड़ता हे आंसुओ,से बेहतर हे अल्फ़ाज़ बेह जाये...
आज भी कुछ ऐसा ही हुआ ज़िन्दगी में पहली बार स्पोर्ट्स बीट कवर कर में अजय सर,अभिषेक सर ऑफिस वापस आ रहे थे।रास्ते में अजय सर ने बोला विधी को देखने नही गये अपन,में अबतक इस नाम से परिचित नही था तो मेने अजय भैया से पूछा की भैया ये विधि कौन हे? विधी छोटी सी 15 साल की बच्ची का नाम हे,प्यारी सी मुस्कान,चेहरे पर इतनी मासूमियत की चांद भी क्या प्यारा लगे विधी के सामने,बातो में घुली हुई गन्ने के रस सी मिठास और आँखे...आँखे मनो उनमे कई झीलो की गहराई समाई हो ...अब में विधी के सामने हॉस्पिटल में उसके बेड के पास बेठा हुआ बस उसे देखे जा रहा था...ईश्वर से मन ही मन सवाल कर रहा था की आप इतनी सी बच्ची को इतनी तकलीफ में कैसे रख सकते हे?दर्द की इन्तेहा क्या हे? पर कहीं से कोई जवाब नही मिला...अजय भैया ..वो कोशिश कर रहे थे भरपूर कोशिश की बस विधी के चेहरे पर मुस्कान जो मुझे कोहिनूर से कीमती लगी बनी रहे...उन्होंने कल ही विधी को मुख्यमंत्री राहत कोष से सहायता उपलब्ध कराई थी। मुझ से भी जितना हो सका विधी को खुश करने की कोशिश करता रहा...विधी तुम ना अगले हफ्ते तक दौड़ लगाने लगोगी,देखो तुम कितना जल्दी चलने लगी हो...हे ना? ठीक हो कर ऑफिस ज़रूर आना और बॉस की चेयर पर बैठकर सबको ऑडर देना....विधी तुम जल्दी से ठीक हो जाओ बस...दोस्तों कभी किसी और का दर्द देखकर समझ आता हे की हमारी ज़िन्दगी कितनी बेहतर हे...और ईश्वर ने हमे बेहतर ज़िन्दगी दी हे तो ये उनका इशारा हे की हम उन लोगो की हर मुमकिन मदद करे जिन्हें ज़रूरत हे..किसी का दर्द हमसे ज़्यादा हे तो हमारा फ़र्ज़ हे की हम उसे बाँट ले...कभी लगता हे की हम दुनिया में सबसे ज़्यादा खुशनसीब लोगो में से हे जो खुद उठकर चल तो सकते हे...पर आज मेने करीब से देखा की दर्द की इंतेहा क्या हे...
विधी जल्दी से दौड़ने लगे और में फिर कुछ लिख सकूँ विधी के लिये...आप भी दुआ करना की विधी जल्दी ठीक हो जाये...विधी फिर अपने घुटनो पर खड़ी हो बिना किसी दर्द के....विधी को गेट वेल सून कहकर हम सब कैंसर हॉस्पिटल से ऑफिस की तरफ चल दीये...मन में अब भी बहुत कुछ चला रहा था..अब भी चल रहा हे...वक़्त कितने इंतेहा ले सकता हे नही पता पर एक विश्वास हे रात किनती भी अंधेरी हो सूरज का निकलना तय हे...
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