प्यारे भाई
सुना हे जब Telephone,Mobile,Internet, SMS,FaceBook,What's app ये सब नही हुआ करते थे उस समय लोग अपने प्रिय जनो को चिट्ठियां लिखा करते थे,चिट्ठियों को अपने पाठको के पास पहुचने में हफ्ते हफ्ते भर तक का समय लग जाता...बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार होता था इन पत्रो का और फिर चिट्ठी भेजने वाला लंबे समय तक अपने पत्र के जवाब का इंतज़ार करता रहता।डाकिया बाबू की साइकिल अगर घर के सामने रुक गयी तो समझलो की घर में खुशिया आयी हे।उस टाइम लोग ज़्यादा पढ़े लिखे भी नही थे तो,डाकिया बाबू खुद ही चिट्ठी को पढ़कर सूनाया करते थे..लोगो में अपनापन था चिट्ठियों के लिफ़ाफ़े खोलने के लिए किसी Password या Pattern lock की ज़रूरत नही पड़ती थी..खेर ये टाइम तो मेने भी नही देखा बस बड़ो से सुना हे तो आज तुम्हे बता रहा हूँ,और मुझे माफ़ करना भाई पत्र लिखने की पौराणिक परंपरा को तोड़ने में कुछ या बहुत कुछ योगदान हमारी पीढ़ी का भी हे तभी तो आज तुम्हारे जन्मदिन पर तुम्हे पत्र की जगह ब्लॉग लिख रहा हूँ ये जानते हुए भी की शायद तुम इसे सात साल की उम्र में पढ़ भी नही पाओगे पर आशा हे की कोई ना कोई तुम्हे पढ़कर सुना देगा पर तुम समझ नही पाओगे कोई बात नही..ये ब्लॉग तुम बड़े हो जाओगे,समझने लगोगे तो एक बार फिर से पढ़ना।
2 दिसंबर 2008
जब तुम्हारा जन्म हुआ तो में भोपाल के LBS होस्पिटल में तुम्हें देखने के लिए वहां पर नही था और अगले एक महीने भी मुझे तुम्हारे दर्शन नही हुए पर सुना था की तुम बिल्कुल छोटे से चूहे की तरह थे..हम सब तुम्हे झूला झुलाते, गोदी में बहुत ध्यान से, सम्भलकर तुम्हे उठाते और यहां वहा घुमाते..देखते ही देखते तुम घुटनो पर चलने लगे अब तुम खुद ही पुरे घर की सैर पर निकल पड़ते और कभी दीवान के नीचे तो कभी पलंग के नीचे मिलते ..एक दिन तुम्हे पहली बार खुद के पेरो पर खड़ा होते हुए देखा उसके लिए तुम्हे बहुत मेहनत करनी पड़ीं थी और तुम खड़े होने के बाद भी कई बार बैलेंस नही बना पाये और गिर गये..तुम्हे चोट भी लगी,रोये भी लेकिन तुमने हार नही मानी जितनी बार गिरे उतनी ही बार तुमने दोबारा कोशिश करी और फिर बिना किसी सहारे के अपने पेरो पर खड़े हो गये..अब तुमने कदम बढ़ाने चाहे तो फिर से कई बार गिरे लेकिन कोशिश करना नही छोड़ा..देखते ही देखते चलना क्या तुम दौड़ना सीख गये और फिर हम सब लोग तुम्हे दोडता हुआ देख तुम्हारे पीछे दौड़ने लगे..आज तुम ये ब्लॉग(letter)खुद से पढ़ रहे हो तो समझने की कोशिश करना की बचपन में अगर बार बार गिरने के बाद खड़े होने की कोशिश करना ही बन्द कर दिया होता तो क्या आज दौड़ पाते??
इसी तरह ज़िन्दगी में भी बहुत सी परेशानियां आती हे,हमे कई बार गिरना भी पड़ता हे,निराशा हाथ लगती हे लेकिन हमेशा उठने की कोशिश करते रहना चाहिए क्योंकि एक बार हम उठ खड़े हुए तो फिर हमे दौड़ने से कोई नही रोक सकता..हमेशा लोग पीछे ही भागेंगे।
Wishing u a very very happy birthday bhai wid tons of love n lots of wishes,God bless u,stay healthy,happy and blessed..
Yours
Vasu