Friday, 11 December 2015

आप के आम लाखो के

एक योग्य और शिक्षित व्यक्ति को देश में बमुश्किल 30 से 40 हज़ार की नोकरी और 3,4 हज़ार रुपय तक का अन्य भत्ता मिल पाता हे लेकिन अगर आप दिल्ली में विधायक बनने की तैयारी कर रहे हे तो फिर आपको फ़िक्र करने की कोई ज़रूरत नही हे।इस समय अपनी इवन और ओड नंबर वाली ट्रैफिक व्यवस्था को लेकर पुरे देशभर के मीडिया में छाये दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने बड़ी ही चतुराई से विधयाको को मिलने वाली तन्खा और भत्ते में सीधे 400 प्रतिशत का इजाफा कर दिया हे अब अगर आप दिल्ली विधायकों की वेतन और भत्ते को जोड़कर देखते हे तो उनकी प्रतिमाह तन्खा होती हे 2 लाख 35 हज़ार रुपय प्रतिमाह जो देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से कहीँ ज़्यादा हे। क्रमशः प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को प्रतिमाह 1 लाख 60 हज़ार रूपय और 1 लाख 50 हज़ार रूपय मिलते हे। अब आप ही बताइये हो गये ना आप के आम लाखो के , देश में राजनीत का तमाशा तो देखिये गरीबो को कड़ाके की ठण्ड में सोने के लिये छत नही मिलती और नेताओ को फर्नीचर के नाम पर लाखो रुपय मिल रहे हे।

वासु चौरे
एम.सी.यू
भोपाल

पढ़े लिखे,चुनाव लड़े

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा की खट्टर सरकार की पंचायती चुनाव अधिनियम में संसोधन की मांग वाली याचिका के पक्ष में सुनवाई करते हुए चुनाव नियमो में फेरबदल करने की अनुमति दे दी हे जिसके तहत अब हरियाणा में पंचयात चुनाव लड़ने के लिये शैक्षणिक योग्यता निर्धारित की जा सकेगी। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सच में स्वागत योग्य भी हे क्योंकि जब देश में एक निचले दर्जे की नोकरी के लिये भी शैक्षणिक योग्यता निर्धारित हे तो नेता बनने के लिये क्यों नही? आई.आई.टी. , आई.पी.एस.सी. , यू.पी.एस.सी. जैसी कई कठिन परीक्षाओ को पास कर और आरक्षण के मकड़ जाल से दो चार होते हुए छात्र किसी पद पर पहुँच पाते हे लेकिन जनाब जरा उसी देश की विडम्बना तो देखिये आज़ादी के साठ साल बाद भी देश के बड़े बड़े राजनेतिक पदों पर पहुचने के लिये कोई भी शैक्षणिक योग्यता तय नही की गयी हे। राजनीत में आने और नेता बनने के लिये आपको किसी भी प्रकार की डिग्री की कोई अवस्यक्ता नही हे, पर हां बाशर्ते आपके पास धनबल और बाहुबल होना चाहिये तभी तो देश में पांचवी फ़ैल विधायक सांसद बन जाते हे,नोवि फ़ैल डिप्टी सी.एम. और अगर आप बारव्ही में फ़ैल भी हे तो भी आप 125 करोड़ से ज़्यादा आबादी वाले देश के मानव संसाधन विकास मंत्री तो बन ही सकते हे। अब आप इसे लोकतंत्र कहे या राजनीत लेकिन शैक्षणिक योग्यता तय ना होने के कारण कई काबिल लोग इन अनपढ़ नेताओ से पीछे रह जाते हे और आयोग्य हाथो में देश भी सही विकास नही कर सकता। राजनीती से सरकार बनती हे और सरकार देश चलाती हे इसलिये ज़रूरी हे की चुनाव लड़ने के लिये प्रत्याशियो का शैक्षणिक स्तर निर्धारित किया जाये ताकि योग्य व्यक्ति सरकार का हिस्सा बन सके।

वासु चौरे

एम.सी.यू
भोपाल

Thursday, 10 December 2015

कटघरे में अदालत

आखिरकार 13 साल पुराने हिट एन्ड रन मामले में गुरूवार को सलमान खान बाइज्जत बरी तो हो गये लेकिन इस फैसले ने अदालत को ही कटघरे में ला खड़ा कर दिया हे।भारत में न्यायिक व्यवस्था आज एक बार फिर से सवालों के घेरे में हे।अदालत को सलमान शराब पीकर गाड़ी चला रहे थे या नही ? ये फैसला करने में 13 साल का वक्त कैसे लग गया ? इसी मामले में सलमान खान को सेशन कोर्ट 5 साल की सजा भी सुना चुका था। कोर्ट की माने तो विपक्ष सलमान पर लगाये आरोपो को सिद्ध करने में 13 साल बाद भी विफल रहा। फैसले के बाद देश का राजनेतिक माहौल भी गरमा गया और सोशल मीडिया पर तीखी टिप्पड़ियां आना शुरू हो गयी जैसे सलमान ने कोर्ट को मुक्त कर दिया,अगर आप मेहंगा वकील रख सकते हे तो केस आप ही जीतेंगे,शराब सलमान ने नही कार ने पी रखी थी। ये पूरा मामला भी सलमान की किसी धमाकेदार फ़िल्म की तरह मीडिया पर छाया रहा। खैर  न्यायपालिका के निर्णय का सम्मान करना हर भारतीय का कर्तव्य हे फिर भले ही अदालत खुद कटघरे में क्यों ना हो।

वासु चौरे
एम.सी.यू
भोपाल

पाक से समग्र बातचीत

पाकिस्तान के साथ समझोते और बातचीत के सिलसिले तो सालो से चले आ रहे हे लेकिन हर बार नतीजा वही ढाक के तीन पात। इस बार भी एशियन समिट के बहाने भारत की की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पाक के दौरे पर हे इस दौरे को लेकर देश में पहले ही राजनेतिक पारा चढ़ा हुआ हे।सुषमा जी जब पाक के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ और विदेश मंत्री सरताज अज़ीज से मिलकर वापस लौटेंगी तो वर्षो से चली आ रही बहस एक बार फिर से गरमा जायेगी फिर चाहे बात करे आतंकवाद की,कश्मीर की या शीज फायर उलन्घन की हर बार  भरोसे के बदले भारत के हाथ धोका और निराशा ही लगी हे।सवाल ये भी उठता हे की  कश्मीर में  और सीमा पर हालात अब भी गंभीर बने हुए हे लेकिन फिर भी सरकार अपने बयान से पलटकर पाक से बातचीत क्यों करना चाहती हे?पाक को आड़े हाथो लेने की बात करने वाली सरकार यू टर्न लेकर पाक से वार्ता करने के लिये बेताब नज़र आ रही हे इससे  भा.ज.पा. के साथ उसके सहयोगी दल शिवसेना की भूमिका पर भी सवाल उठना लाज़मी हे। इसी प्रकार 1998 में अटल जी ने भी कॉम्पोजिट डॉयेलाग की शुरुआत करी थी जिसका अंत 2008 मुम्बई हमलो के बाद हुआ। पाक के साथ समग्र बातचीत में समग्र सावधानी बरतना भी  ज़रूरी हे  क्योंकि ज़ख्मो को हरा होने में वक़्त नही लगता।

वासु चौरे
एम.सी.यू
भोपाल

Tuesday, 1 December 2015

A blog on his 7th bday


प्यारे भाई

सुना हे जब Telephone,Mobile,Internet, SMS,FaceBook,What's app ये  सब नही हुआ करते थे उस समय लोग अपने प्रिय जनो को चिट्ठियां लिखा करते थे,चिट्ठियों को अपने पाठको के पास पहुचने में हफ्ते हफ्ते भर तक का समय लग जाता...बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार होता था इन पत्रो का और फिर चिट्ठी भेजने वाला लंबे समय तक अपने पत्र के जवाब का इंतज़ार करता रहता।डाकिया बाबू की साइकिल अगर घर के सामने रुक गयी तो समझलो की घर में खुशिया आयी हे।उस टाइम लोग ज़्यादा पढ़े लिखे भी नही थे तो,डाकिया बाबू खुद ही चिट्ठी को पढ़कर सूनाया करते थे..लोगो में अपनापन था चिट्ठियों के लिफ़ाफ़े खोलने के लिए किसी Password या Pattern lock की ज़रूरत नही पड़ती थी..खेर ये टाइम तो मेने भी नही देखा बस बड़ो से सुना हे तो आज तुम्हे बता रहा हूँ,और मुझे माफ़ करना भाई पत्र लिखने की पौराणिक  परंपरा को तोड़ने में कुछ या बहुत कुछ योगदान हमारी पीढ़ी का भी हे तभी तो आज तुम्हारे जन्मदिन पर तुम्हे पत्र की जगह ब्लॉग लिख रहा हूँ ये जानते हुए भी की शायद तुम इसे सात साल की उम्र में पढ़ भी नही पाओगे पर आशा हे की कोई ना कोई तुम्हे पढ़कर सुना देगा पर तुम समझ नही पाओगे कोई बात नही..ये ब्लॉग तुम बड़े हो जाओगे,समझने लगोगे तो एक बार फिर से पढ़ना।

2 दिसंबर 2008
जब तुम्हारा जन्म हुआ तो में भोपाल के LBS होस्पिटल में तुम्हें देखने के लिए वहां पर नही था और अगले एक महीने भी मुझे तुम्हारे  दर्शन नही हुए पर सुना था की तुम बिल्कुल छोटे से चूहे की तरह थे..हम सब तुम्हे झूला झुलाते, गोदी में बहुत ध्यान से, सम्भलकर तुम्हे उठाते और यहां वहा घुमाते..देखते ही देखते तुम घुटनो पर चलने लगे अब तुम खुद ही पुरे घर की सैर पर निकल पड़ते और कभी दीवान के नीचे तो कभी पलंग के नीचे मिलते ..एक दिन तुम्हे पहली बार खुद के पेरो पर खड़ा होते हुए देखा उसके लिए तुम्हे बहुत मेहनत करनी पड़ीं थी और तुम खड़े होने के बाद भी कई बार बैलेंस नही बना पाये और गिर गये..तुम्हे चोट भी लगी,रोये भी लेकिन तुमने हार नही मानी जितनी बार गिरे उतनी ही बार तुमने दोबारा कोशिश करी और फिर बिना किसी सहारे के अपने पेरो पर खड़े हो गये..अब तुमने कदम बढ़ाने  चाहे तो फिर से कई बार गिरे लेकिन कोशिश करना नही छोड़ा..देखते ही देखते चलना क्या तुम दौड़ना सीख गये और फिर हम सब लोग तुम्हे दोडता हुआ देख तुम्हारे पीछे दौड़ने लगे..आज तुम ये ब्लॉग(letter)खुद से पढ़ रहे हो तो समझने की कोशिश करना की बचपन में अगर बार बार गिरने के बाद खड़े होने की कोशिश करना ही बन्द कर दिया होता तो क्या आज दौड़ पाते??
इसी तरह ज़िन्दगी में भी बहुत सी परेशानियां आती हे,हमे कई बार गिरना भी पड़ता हे,निराशा हाथ लगती हे लेकिन हमेशा उठने की कोशिश करते रहना चाहिए क्योंकि एक बार हम उठ खड़े हुए तो फिर हमे दौड़ने से कोई नही रोक सकता..हमेशा लोग पीछे ही  भागेंगे।

Wishing u a very very happy birthday bhai wid tons of love n lots of wishes,God bless u,stay healthy,happy and blessed..

Yours
Vasu

Friday, 27 November 2015

अनाथालय फरिश्तों का घर

हर बच्चा भगवान का रूप होता हे पर भगवान ने जेल में भी जन्म लिया हे और महल में भी..ऐसे ही हर बच्चे की यादो में घर में गुज़रे बचपन की मधुर यादे नही होती कुछ की यादो में  बचपन घर के आंगन में नही अनाथालय के मैदान में  होता हे। हम तो वो खुशनसीब हे जिन्हें माँ का आँचल सोने के लिए और घूमने के लिए पिता का कन्धा मिला,हमारी ज़रूरते जवान पर आने के पहले ही पूरी हो जाती रही..हमे किसी ने चलना सिखाया ऊँगली पकड़कर वो खुद ही चलना सीख गये हे गिरकर,लड़खड़ाकर।में बात कर रहा हूँ उनकी जो दुनिया में आते ही अकेले पड़ गये 'अनाथ' ।

बात कुछ दिन पुरानी हे,मेरे स्व. नाना जी जो अपने आप में एक आदर्श थे उनकी स्मृति में भोज का आयोजन रखा गया था,में भी वहां उपस्थित था।सुबह से दोपहर  में देर तक भोज चलता रहा दिनभर की भागदौड़ के बाद थककर एक कुर्सी पर शरण ली ही थी की मामी जी ने एक और फरमान जारी कर दिया, खाने के पैकेट्स बनाकर गरीबो और अनाथालय में रहने वाले  बच्चों को  पहुचना था।एक बार फिर में और मेरे सभी बड़े भाई बहन पैकेट्स बनाने में जुट गये।शानदार पैकिंग का आईडिया जीजू का था और पैकिंग करने में हमारा मार्गदर्शन मामी एवम् मौसी जी ने किया आधे घण्टे बाद ही लगभग 60,70 खाने के पैकेट्स तैयार थे।पैजेट्स लेकर हम एक अनाथालय के बाहर पहुंचे तो हमारा स्वागत किया एक स्वर में आ रही छोटे छोटे बच्चों की प्यारी आवाज़ ने  दो एकम दो,दो दुनी चार....
कदम अंदर की और बढे तो एक हॉल के झरोखे से
नन्हे मुन्नों को पढ़ते हुआ देखा कदम वहीँ रुक गये,जीजू और भैया संचालक महोदय से मिलने आगे निकल चुके थे पर में वही खड़े खड़े उन मासूमो को निहार रहा था..उन्हें देखकर अपने बचपन की याद आ रही थी जो उनके जैसा बिल्कुल नही था..वो अपने घर पर नही अनाथालय में थे पर  फिर भी वो कितने खुश दिख रहे थे..उनके चेहरे पर हंस रही मासूमियत और दिल की सच्चाई का सबूत देती उनकी आँखों की चमक ने मुझे ये सोचने पर मजबूर कर दिया की हर खाव्हिश हमारी पूरी हो जाती हे पर फिर भी चेहरे पर वो सच्ची मुस्कान नही आ पाती,उनके कपडे पुराने थे,मेले फटे थे पर में ब्रांडेड कपड़ो में भी खुद को उनसे ज़्यादा अच्छा नही लग रहा था शायद उनका दिल मुझसे कहीँ ज़्यादा खूबसूरत था।मेरे पास हर वो चीज़ होगी जिसे वो अपना बनाने का सोच भी नही पाते होंगे पर संतुष्टि मुझे उनके चेहरे पर दिखी ...मुझे तो अभी भी बहुत कुछ चाहिये ना..किसी काम से उनकी शिक्षिका हॉल से बाहर निकली तो में खुद को अंदर जाने से रोक नही पाया।मुझे देखकर उनकी वो प्यारी मुस्कान एक इंच और बढ़ गयी शायद समझ गए होंगे की में उनके लिये
कुछ ले कर आया हूँ।उन्होंने हाथ जोड़कर मेरा अभिवादन किया जिसके में लायक भी नही...तो आँखे भर आयी मेने भी अपने दोनों हाथ जोड़लिये पर मुंह से चाहते हुए भी एक शब्द नही निकला..एक बात जिसने मुझे काफी प्रभावित किया वो थी उनका अनुसासन टीचर की अनुपस्थिति में भी वो अपना काम उसी स्वर में लगातार कर रहे थे..हॉल अब भी दो एकम दो,दो दुनी चार की आवाज़ से गूंज रहा था..और में उन्हें अब और करीब से निहार रहा था..उनसे खुद की तुलना कर रहा था और खुद को उनसे भी छोटा महसूस कर रहा था..भरी हुई आँखों से पहला आंसु गिरने ही वाला था की पीछे से भैया की आवाज़ आयी वासु चलो..बिना पीछे मुड़े ही आगे बढ़ गया....दोस्तों ये अनाथ नही फ़रिश्ते हे और अनाथालय घर हे फरिश्तों का।एक बात मन में आयी  की अगली बार जब यहां आऊंगा तो पूरी टीम के साथ इन बच्चों पर एक शार्ट फ़िल्म बनाने ..आप भी चलेंगे ना..?