Sunday, 29 January 2017

An Effort

"भागीदारी करो तो किसी के दुःख में करो
सुख में तो साझेदार बहुत होते हे"

कोई किसी के जीवन में बदलाव लाता हे तो कोई समाज में...जब पत्रकारिता की पढाई शुरू करी थी तो सबसे शुरुआती सबको में यह समझ लिया था की पत्रकारिता समाज और देश हित में ही करनी हे,अब पत्रकारिता की पढ़ाई आधी पूर्ण हो चुकी हे और सही वक़्त आ गया हे उन बातो को अमल में लाने का जो बाते अब तक पढ़ी,सुनी,सीखी और समझी हे।

दोस्तो, मदद की ज़रूरत किसे नही होती एक छात्र को शिक्षक की,बच्चे को मता-पिता की...हमे अपने पड़ोसी की मदद की ज़रूरत भी अक्सर पड़ती ही रहती हे कुछ इसी तरह हमारे समाज में रहने वाले एक तबके को हमारी मदद की ज़रूरत हे...वो समाज का शायद सबसे पिछड़ा हुआ तबका हे और हम जिस वर्ग की   बात रहे हे वो वर्ग उस तबके में भी सबसे पिछड़ा वर्ग हे ...हालात हाथो से खराब किये हुए नही हे,प्रकृति के नियम ही निराले हे।

ज़्यादा लंबा लिखने का मतलब हे अपनी रीडरशिप को तलवार की धार पर रखना तो अब सीधे विषय पर बात करता हूँ...

हम बात कर रहे हे उन लड़कियों की जो अपनी मज़बूरी,लाचारी के कारण इस युग में पीछे रह गयी हे...यह दर्द उन महिलाओं का हे जो Loreal,Garnier,Ponds age miracle,fair and lovely  और ना जाने क्या क्या...iconic eyes... पर यह उनकी दास्तां हे  जिनकी आँखों में अँधेरा हे जो इन सबसे कोसो दूर हे जिनकी ज़िन्दगी हर रोज़ एक नई जंग हे ..में जानता हूँ ये ब्यूटी प्रोडक्ट्स रोटी,कपड़ा,मकान की तरह मूल ज़रूरत नही हे पर पीरियड्स के दिनों में एक महिला के लिये सैनेटरी पैड्स ज़रूर एक मूलभूत आवश्यकता हे।

जागरूकता,धन,शिक्षा के अभाव में बहुत सी महिलाये अब तक इस मूलभूत सुविधा से वंचित हे...पहले ही अपनी ज़िन्दगी की जंग लड़ रही इस आधी आबादी के लिए महीने के कठिन दिन ना जाने और कितने कठिन हो जाते होंगे समझ पाना हमारे बस की बात नही।

ऊपर वाले ने अगर हमें किसी और से ज़्यादा दिया हे तो हमारा यह फ़र्ज़ बनता हे की हम उसे उनके साथ बांटे जिन्हें ज़रूरत हे..मुझे गर्व हे की इस बात को हमारे ग्रुप ने बखूबी समझा और महिमा तारे आंटी की प्रेरणा से ज़रूरतमंद महिलाओं तक सैनेटरी पैड्स जैसी मूलभूत सुविधा पहुँचाने का निश्चय किया।

इस विषय पर सोचना और काम करना ज़ाहिर सी बात हे कोई आम काम नही हे पर पत्रकारिता के छेत्र में आना और सीधे समाज से जुड़कर काम करना भी खास हे..खास काम में खासी दिक्कते अक्सर आती ही हे और शायद उन दिक्कतों का सामना हमे भी करना पड़े पर आपके साथ से ज़रूर राहे आसान हो सकती हे।

आइये हम सब भी महिला सशक्तिकरण,स्वच्छ भारत-स्वस्थ भारत की पूरक,इस अनूठी पहल में अपनी सहभागिता दे।

#HopeProductionInitiative
#boldStep
#VasuChourey

Saturday, 7 January 2017

'विधी'

लिखने को तो अक्सर ज़हन में बहुत कुछ होता हे पर जब कोई बात गहराई से दिल को छू जाती हे तो लिखना ही पड़ता हे आंसुओ,से बेहतर हे अल्फ़ाज़ बेह जाये...

आज भी कुछ ऐसा ही हुआ ज़िन्दगी में पहली बार स्पोर्ट्स बीट कवर कर में अजय सर,अभिषेक सर ऑफिस वापस आ रहे थे।रास्ते में अजय सर ने बोला विधी को देखने नही गये अपन,में  अबतक इस नाम से परिचित नही था तो मेने अजय भैया से पूछा की भैया ये विधि कौन हे? विधी छोटी सी 15 साल की बच्ची का नाम हे,प्यारी सी मुस्कान,चेहरे पर इतनी मासूमियत की चांद भी क्या प्यारा लगे विधी के सामने,बातो में घुली हुई गन्ने के रस सी मिठास और आँखे...आँखे मनो उनमे कई झीलो की गहराई समाई हो ...अब में विधी के सामने हॉस्पिटल में उसके बेड के पास बेठा हुआ बस उसे देखे जा रहा था...ईश्वर से मन ही मन सवाल कर रहा था की आप इतनी सी बच्ची को इतनी तकलीफ में कैसे रख सकते हे?दर्द की इन्तेहा क्या हे? पर कहीं से कोई जवाब  नही मिला...अजय भैया ..वो कोशिश कर रहे थे भरपूर कोशिश की बस विधी के चेहरे पर मुस्कान जो मुझे कोहिनूर से कीमती लगी बनी रहे...उन्होंने कल ही विधी को मुख्यमंत्री राहत कोष से सहायता उपलब्ध कराई थी। मुझ से  भी जितना हो सका विधी को खुश करने की कोशिश करता रहा...विधी तुम ना अगले हफ्ते तक दौड़ लगाने लगोगी,देखो तुम कितना जल्दी चलने लगी हो...हे ना? ठीक हो कर ऑफिस ज़रूर आना और बॉस की चेयर पर बैठकर सबको ऑडर देना....विधी तुम जल्दी से ठीक हो जाओ बस...दोस्तों कभी किसी और का दर्द देखकर समझ आता हे की हमारी ज़िन्दगी कितनी बेहतर हे...और ईश्वर ने हमे बेहतर ज़िन्दगी दी हे तो ये उनका इशारा हे की हम उन लोगो की हर मुमकिन मदद करे जिन्हें ज़रूरत हे..किसी का दर्द हमसे ज़्यादा हे तो हमारा फ़र्ज़ हे की हम उसे बाँट ले...कभी लगता हे की हम दुनिया में सबसे ज़्यादा खुशनसीब लोगो में से हे जो खुद उठकर चल तो सकते हे...पर आज मेने करीब से देखा की दर्द की इंतेहा क्या हे...
विधी जल्दी से दौड़ने लगे और में फिर कुछ लिख सकूँ विधी के लिये...आप भी दुआ करना की विधी जल्दी ठीक हो जाये...विधी फिर अपने घुटनो पर खड़ी हो  बिना किसी दर्द के....विधी को गेट वेल सून कहकर हम सब कैंसर हॉस्पिटल से ऑफिस की तरफ चल दीये...मन में अब भी बहुत कुछ चला रहा था..अब भी चल रहा हे...वक़्त कितने इंतेहा ले सकता हे नही पता पर एक विश्वास हे रात किनती भी अंधेरी हो सूरज का निकलना तय हे...