Friday, 27 November 2015

अनाथालय फरिश्तों का घर

हर बच्चा भगवान का रूप होता हे पर भगवान ने जेल में भी जन्म लिया हे और महल में भी..ऐसे ही हर बच्चे की यादो में घर में गुज़रे बचपन की मधुर यादे नही होती कुछ की यादो में  बचपन घर के आंगन में नही अनाथालय के मैदान में  होता हे। हम तो वो खुशनसीब हे जिन्हें माँ का आँचल सोने के लिए और घूमने के लिए पिता का कन्धा मिला,हमारी ज़रूरते जवान पर आने के पहले ही पूरी हो जाती रही..हमे किसी ने चलना सिखाया ऊँगली पकड़कर वो खुद ही चलना सीख गये हे गिरकर,लड़खड़ाकर।में बात कर रहा हूँ उनकी जो दुनिया में आते ही अकेले पड़ गये 'अनाथ' ।

बात कुछ दिन पुरानी हे,मेरे स्व. नाना जी जो अपने आप में एक आदर्श थे उनकी स्मृति में भोज का आयोजन रखा गया था,में भी वहां उपस्थित था।सुबह से दोपहर  में देर तक भोज चलता रहा दिनभर की भागदौड़ के बाद थककर एक कुर्सी पर शरण ली ही थी की मामी जी ने एक और फरमान जारी कर दिया, खाने के पैकेट्स बनाकर गरीबो और अनाथालय में रहने वाले  बच्चों को  पहुचना था।एक बार फिर में और मेरे सभी बड़े भाई बहन पैकेट्स बनाने में जुट गये।शानदार पैकिंग का आईडिया जीजू का था और पैकिंग करने में हमारा मार्गदर्शन मामी एवम् मौसी जी ने किया आधे घण्टे बाद ही लगभग 60,70 खाने के पैकेट्स तैयार थे।पैजेट्स लेकर हम एक अनाथालय के बाहर पहुंचे तो हमारा स्वागत किया एक स्वर में आ रही छोटे छोटे बच्चों की प्यारी आवाज़ ने  दो एकम दो,दो दुनी चार....
कदम अंदर की और बढे तो एक हॉल के झरोखे से
नन्हे मुन्नों को पढ़ते हुआ देखा कदम वहीँ रुक गये,जीजू और भैया संचालक महोदय से मिलने आगे निकल चुके थे पर में वही खड़े खड़े उन मासूमो को निहार रहा था..उन्हें देखकर अपने बचपन की याद आ रही थी जो उनके जैसा बिल्कुल नही था..वो अपने घर पर नही अनाथालय में थे पर  फिर भी वो कितने खुश दिख रहे थे..उनके चेहरे पर हंस रही मासूमियत और दिल की सच्चाई का सबूत देती उनकी आँखों की चमक ने मुझे ये सोचने पर मजबूर कर दिया की हर खाव्हिश हमारी पूरी हो जाती हे पर फिर भी चेहरे पर वो सच्ची मुस्कान नही आ पाती,उनके कपडे पुराने थे,मेले फटे थे पर में ब्रांडेड कपड़ो में भी खुद को उनसे ज़्यादा अच्छा नही लग रहा था शायद उनका दिल मुझसे कहीँ ज़्यादा खूबसूरत था।मेरे पास हर वो चीज़ होगी जिसे वो अपना बनाने का सोच भी नही पाते होंगे पर संतुष्टि मुझे उनके चेहरे पर दिखी ...मुझे तो अभी भी बहुत कुछ चाहिये ना..किसी काम से उनकी शिक्षिका हॉल से बाहर निकली तो में खुद को अंदर जाने से रोक नही पाया।मुझे देखकर उनकी वो प्यारी मुस्कान एक इंच और बढ़ गयी शायद समझ गए होंगे की में उनके लिये
कुछ ले कर आया हूँ।उन्होंने हाथ जोड़कर मेरा अभिवादन किया जिसके में लायक भी नही...तो आँखे भर आयी मेने भी अपने दोनों हाथ जोड़लिये पर मुंह से चाहते हुए भी एक शब्द नही निकला..एक बात जिसने मुझे काफी प्रभावित किया वो थी उनका अनुसासन टीचर की अनुपस्थिति में भी वो अपना काम उसी स्वर में लगातार कर रहे थे..हॉल अब भी दो एकम दो,दो दुनी चार की आवाज़ से गूंज रहा था..और में उन्हें अब और करीब से निहार रहा था..उनसे खुद की तुलना कर रहा था और खुद को उनसे भी छोटा महसूस कर रहा था..भरी हुई आँखों से पहला आंसु गिरने ही वाला था की पीछे से भैया की आवाज़ आयी वासु चलो..बिना पीछे मुड़े ही आगे बढ़ गया....दोस्तों ये अनाथ नही फ़रिश्ते हे और अनाथालय घर हे फरिश्तों का।एक बात मन में आयी  की अगली बार जब यहां आऊंगा तो पूरी टीम के साथ इन बच्चों पर एक शार्ट फ़िल्म बनाने ..आप भी चलेंगे ना..?

7 comments:

  1. उन बच्चों की सरलता ही उन सब बच्चों को हमसे अलग बनाकर भी अपना बना देती है।

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  2. उन बच्चों की सरलता ही उन सब बच्चों को हमसे अलग बनाकर भी अपना बना देती है।

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    1. बिल्कुल सही कहा धीरू भाई

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  3. vasu bhai aapke is neek vichar se hm shmt h.......

    sahi h aap ...
    safalta ki orr agrasar h aapke kdm

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद ऋषभ भाई आपका 😇

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  4. क्या सच में अनाथालय फरिश्तो का घर है..........

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    1. जी...आपको नही लगता?
      और अगर नही लगता तो क्रप्या अपनी चिंता व्यक्त करे 😇

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