Wednesday, 3 May 2017

डॉ.अंकुर पारे द्वारा लिखित पुस्तक-विस्थापित परिवारों का समाजशास्त्रीय अध्ययन' की समीक्षा।

लेखक -डॉ. अंकुर पारे 

देश -भारत 

पुस्तक -विस्थापित परिवारों का समाजशास्त्रीय अध्ययन

भाषा -हिंदी 

प्रकाशक -सनराइज़ पब्लिकेशन, नई दिल्ली (भारत)

प्रकाशन वर्ष -2017 

मीडिया प्रकार -प्रिंट (हार्डबैक)

पृष्ठ संख्या -183 

ISBN-978-93-80966-70-0

मूल्य -रु 800 

परिचय –

डॉ. अंकुर पारे प्रसिद्ध युवा समाजशास्त्री एवं लेखक है | इनके अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में कई महत्वपूर्ण शोध पेपर प्रकाशित हो चुकें है | इनका प्रमुख शोध कार्य विस्थापन, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन पर रहा है |

समीक्षा –

लेखक डॉ. अंकुर पारे ने अपनी पुस्तक “ विस्थापित परिवारों का समाजशास्त्रीय अध्ययन ” में विस्थापन की समस्या का शोधपरक वैज्ञानिक अध्ययन किया है | विस्थापन एक वैश्विक भयावह समस्या है | आर्थिक विकास सभी देशों के लिए अत्यंत आवश्यक है लेकिन विकास परियोजनाओं के सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभाव भी उभर कर सामने आतें है | विकास के कारण विस्थापन अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय समस्या के रूप में उभरा है | वैश्विक स्तर पर जहाँ लैबनान, सीरिया, सुडान, घाना, इंडोनेशिया एवं भारत में टिहरी परियोजना उत्तराखंड, बिसलपुर परियोजना हिमाचल प्रदेश, सरदार सरोवर परियोजना गुजरात, कुडनकुलम परियोजना तमिलनाडु, नर्मदा परियोजना मध्यप्रदेश आदि के कारण जो विस्थापन की पीड़ा सामने आई है उसको दूर करने एवं विकास परियोजनाओं का सही क्रियान्वयन हो सके, इस पुस्तक में व्यवहारिक शोधपरक व्याख्या की गई है |

संस्करण –

भारत के प्रमुख सनराइज़ प्रकाशन, नई दिल्ली (भारत) ISBN 978-93-80966-70-0 द्वारा लेखक डॉ. अंकुर पारे की पुस्तक “ विस्थापित परिवारों का समाजशास्त्रीय अध्ययन ” वर्ष 2017 में प्रकाशित की गई |

निष्कर्ष –

समाजशास्त्री डॉ. अंकुर पारे ने विस्थापन के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं राजनीतिक प्रभावों का विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन किया है | उन्होंने “ न्यूनतम विस्थापन एवं अधिकतम पुनर्वास ” के पालन का सुझाव दिया है |

Thursday, 27 April 2017

किताबों की ज़रूरत है...

ज़िन्दगी की परिभाषा हर किसी के लिए अलग हो सकती है किसी के लिये शायद कुछ सरल हो तो किसी के लिये कठिन,सबके लिये समान हो ये मुश्किल है पर सबके लिये बेहतर तो बनाई जा सकती है।हम सब जानते है।हमारे देश में एक बड़ा तबका आज भी गरीबी रेखा के नीचे अपना जीवन गुजर-बसर करने वालो का है।गरीबी के कई कारण हो सकते है  पर आज विश्विद्यालय के पास दो तीन गरीब बच्चों से हुई बातचीत ने देश के इस अभिषाप के मूल कारण के बारे में सोचने के लिये प्रेरित किया,दरअसल ये बच्चे एक चबूतरे पर थोड़ी सी इमली और कुछ कैरीयां
लिये उन्हें बेचने बेठे थे,उम्र होगी 5 से 8 साल जो सामान बेच रहे थे उसकी कीमत का भी उन्हें अंदाज़ा ना था फिर भी मैने पूछा जो पैसे मिलेंगे इनसे उनका क्या करोगे उत्तर मिला की खाना पकायेंगे।स्कूल के बारे में पूछा तो बताया की हां, जाते हे और किताबो की बात की तो बच्चों ने कहा की 1,2,3 और बाराखड़ी की किताबे चाहिये हे,तब मुझे लगा की अगर इन्हें ये किताबे मिल जाये तो शायद इनका भविष्य इनके वर्तमान की तरह अन्धकारमय नही होगा।
इस सब के बीच  एक बात समझ आई की देश में गरीबी का मुख्य कारण अशिक्षा ही है।
विगत सरकरों से लेकर अबतक की सरकारों ने गरीबी को हटाने के लिये अपने स्तर पर काफी प्रयास किये,योजनाये बनाई परंतु जानकारी के अभाव और अशिक्षा के चलते एक बड़ा तबका इन व्यवस्थाओ का लाभ लेने से वंचित रह गया,अशिक्षा की समस्या सिर्फ गरीबी तक  सीमित नही है,इसके और भी दुष्परिणाम हमारे सामने हे जिनमे मुख्य हे बढ़ती अपराधिक मानसिकता शिक्षा और वैभव के अभाव में व्यक्ति कई बार ना चाहते हुए भी अपराधो की दुनिया में प्रवेश कर लेता है।
हमारे लिये बड़ी विडम्बना यह भी है की जहां एक और हम मंगल तक पहुंच गये हें,विज्ञान से लेकर खेल की दुनिया तक हमने कई कीर्तिमान स्थापित किये परंतु वही दूसरी तरफ हमारे ही  देश में कुछ मासूम हाथो तक अबतक किताबे नही पहुँच पायी है।
शिक्षा ही एक माध्यम है जिससे हम गरीबी को मिटा सकते हें,देश की एक और पीढ़ी गरीब बड़ी हो उससे पहले  ज़रूरत हे सार्थक प्रयासों की जिससे हम अपने देश के भविष्य को अशिक्षा के  अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर लेकर जाये ताकि भारत के उज्ज्वल भविष्य की मजबूत नीव तैयार हो सके,इसकी ज़िम्मेदारी सिर्फ सरकार की नही हम सबकी है।

वासु चौरे

Sunday, 29 January 2017

An Effort

"भागीदारी करो तो किसी के दुःख में करो
सुख में तो साझेदार बहुत होते हे"

कोई किसी के जीवन में बदलाव लाता हे तो कोई समाज में...जब पत्रकारिता की पढाई शुरू करी थी तो सबसे शुरुआती सबको में यह समझ लिया था की पत्रकारिता समाज और देश हित में ही करनी हे,अब पत्रकारिता की पढ़ाई आधी पूर्ण हो चुकी हे और सही वक़्त आ गया हे उन बातो को अमल में लाने का जो बाते अब तक पढ़ी,सुनी,सीखी और समझी हे।

दोस्तो, मदद की ज़रूरत किसे नही होती एक छात्र को शिक्षक की,बच्चे को मता-पिता की...हमे अपने पड़ोसी की मदद की ज़रूरत भी अक्सर पड़ती ही रहती हे कुछ इसी तरह हमारे समाज में रहने वाले एक तबके को हमारी मदद की ज़रूरत हे...वो समाज का शायद सबसे पिछड़ा हुआ तबका हे और हम जिस वर्ग की   बात रहे हे वो वर्ग उस तबके में भी सबसे पिछड़ा वर्ग हे ...हालात हाथो से खराब किये हुए नही हे,प्रकृति के नियम ही निराले हे।

ज़्यादा लंबा लिखने का मतलब हे अपनी रीडरशिप को तलवार की धार पर रखना तो अब सीधे विषय पर बात करता हूँ...

हम बात कर रहे हे उन लड़कियों की जो अपनी मज़बूरी,लाचारी के कारण इस युग में पीछे रह गयी हे...यह दर्द उन महिलाओं का हे जो Loreal,Garnier,Ponds age miracle,fair and lovely  और ना जाने क्या क्या...iconic eyes... पर यह उनकी दास्तां हे  जिनकी आँखों में अँधेरा हे जो इन सबसे कोसो दूर हे जिनकी ज़िन्दगी हर रोज़ एक नई जंग हे ..में जानता हूँ ये ब्यूटी प्रोडक्ट्स रोटी,कपड़ा,मकान की तरह मूल ज़रूरत नही हे पर पीरियड्स के दिनों में एक महिला के लिये सैनेटरी पैड्स ज़रूर एक मूलभूत आवश्यकता हे।

जागरूकता,धन,शिक्षा के अभाव में बहुत सी महिलाये अब तक इस मूलभूत सुविधा से वंचित हे...पहले ही अपनी ज़िन्दगी की जंग लड़ रही इस आधी आबादी के लिए महीने के कठिन दिन ना जाने और कितने कठिन हो जाते होंगे समझ पाना हमारे बस की बात नही।

ऊपर वाले ने अगर हमें किसी और से ज़्यादा दिया हे तो हमारा यह फ़र्ज़ बनता हे की हम उसे उनके साथ बांटे जिन्हें ज़रूरत हे..मुझे गर्व हे की इस बात को हमारे ग्रुप ने बखूबी समझा और महिमा तारे आंटी की प्रेरणा से ज़रूरतमंद महिलाओं तक सैनेटरी पैड्स जैसी मूलभूत सुविधा पहुँचाने का निश्चय किया।

इस विषय पर सोचना और काम करना ज़ाहिर सी बात हे कोई आम काम नही हे पर पत्रकारिता के छेत्र में आना और सीधे समाज से जुड़कर काम करना भी खास हे..खास काम में खासी दिक्कते अक्सर आती ही हे और शायद उन दिक्कतों का सामना हमे भी करना पड़े पर आपके साथ से ज़रूर राहे आसान हो सकती हे।

आइये हम सब भी महिला सशक्तिकरण,स्वच्छ भारत-स्वस्थ भारत की पूरक,इस अनूठी पहल में अपनी सहभागिता दे।

#HopeProductionInitiative
#boldStep
#VasuChourey

Saturday, 7 January 2017

'विधी'

लिखने को तो अक्सर ज़हन में बहुत कुछ होता हे पर जब कोई बात गहराई से दिल को छू जाती हे तो लिखना ही पड़ता हे आंसुओ,से बेहतर हे अल्फ़ाज़ बेह जाये...

आज भी कुछ ऐसा ही हुआ ज़िन्दगी में पहली बार स्पोर्ट्स बीट कवर कर में अजय सर,अभिषेक सर ऑफिस वापस आ रहे थे।रास्ते में अजय सर ने बोला विधी को देखने नही गये अपन,में  अबतक इस नाम से परिचित नही था तो मेने अजय भैया से पूछा की भैया ये विधि कौन हे? विधी छोटी सी 15 साल की बच्ची का नाम हे,प्यारी सी मुस्कान,चेहरे पर इतनी मासूमियत की चांद भी क्या प्यारा लगे विधी के सामने,बातो में घुली हुई गन्ने के रस सी मिठास और आँखे...आँखे मनो उनमे कई झीलो की गहराई समाई हो ...अब में विधी के सामने हॉस्पिटल में उसके बेड के पास बेठा हुआ बस उसे देखे जा रहा था...ईश्वर से मन ही मन सवाल कर रहा था की आप इतनी सी बच्ची को इतनी तकलीफ में कैसे रख सकते हे?दर्द की इन्तेहा क्या हे? पर कहीं से कोई जवाब  नही मिला...अजय भैया ..वो कोशिश कर रहे थे भरपूर कोशिश की बस विधी के चेहरे पर मुस्कान जो मुझे कोहिनूर से कीमती लगी बनी रहे...उन्होंने कल ही विधी को मुख्यमंत्री राहत कोष से सहायता उपलब्ध कराई थी। मुझ से  भी जितना हो सका विधी को खुश करने की कोशिश करता रहा...विधी तुम ना अगले हफ्ते तक दौड़ लगाने लगोगी,देखो तुम कितना जल्दी चलने लगी हो...हे ना? ठीक हो कर ऑफिस ज़रूर आना और बॉस की चेयर पर बैठकर सबको ऑडर देना....विधी तुम जल्दी से ठीक हो जाओ बस...दोस्तों कभी किसी और का दर्द देखकर समझ आता हे की हमारी ज़िन्दगी कितनी बेहतर हे...और ईश्वर ने हमे बेहतर ज़िन्दगी दी हे तो ये उनका इशारा हे की हम उन लोगो की हर मुमकिन मदद करे जिन्हें ज़रूरत हे..किसी का दर्द हमसे ज़्यादा हे तो हमारा फ़र्ज़ हे की हम उसे बाँट ले...कभी लगता हे की हम दुनिया में सबसे ज़्यादा खुशनसीब लोगो में से हे जो खुद उठकर चल तो सकते हे...पर आज मेने करीब से देखा की दर्द की इंतेहा क्या हे...
विधी जल्दी से दौड़ने लगे और में फिर कुछ लिख सकूँ विधी के लिये...आप भी दुआ करना की विधी जल्दी ठीक हो जाये...विधी फिर अपने घुटनो पर खड़ी हो  बिना किसी दर्द के....विधी को गेट वेल सून कहकर हम सब कैंसर हॉस्पिटल से ऑफिस की तरफ चल दीये...मन में अब भी बहुत कुछ चला रहा था..अब भी चल रहा हे...वक़्त कितने इंतेहा ले सकता हे नही पता पर एक विश्वास हे रात किनती भी अंधेरी हो सूरज का निकलना तय हे...

Sunday, 11 December 2016

मील के पत्थर से ज़्यादा कुछ नही मंज़िले,रास्ते आवाज़ देते हे सफर जारी रखो

12062 जबलपुर-हबीबगंज जनशताब्दी एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय से 15 मिनिट देरी से चल रही हे आपको हुई असुविधा के लिए हमे खेद हे... 3 दिन करेली में बिताकर कल रात को बैग जमाते हुए कुछ और यादे भी बेग में ठूस ली,रोहित भैया की शादी में नरसिंहपुर और गाडरवारा के साथियो से मुलाकत,लगभग 3 साल बाद संस्कारधानी में शॉपिंग साथ ही  जबलपुर की हैदराबादी बिरयानी।घर आओ तो शाम का इंतज़ार बेसब्री से रहता हे, और हो भी क्यों ना शाम का समय ही तो होता हे जब दो बेहद अज़ीज़ मित्रो से मुलाक़ात होती हे असफाक और  समीर,सालो से चली आ रही दोनों की आपसी नोकझोंक मे कब लाल सूरज ढल जाता हे और  चाँद अपनी चांदनी समेटे हुए निकाल आता हे पता ही नही चलता और इसी बीच आग में घी डालने के लिए हमारे अंचल भाई हो तो समझ लीजिये सोने पर प्लैटिनम।मलखान के चाय के टपरे पर ठंडी लोहे की बेंच पर बैठकर गरमा-गर्म चाय का मज़ा ही कुछ और होता हे चाय की हर चुस्की के साथ किसी ना किसी दोस्त की याद जुडी हुई होती हे जो मुस्कान बनकर चेहरे पर खिल उठती हे,चाय के बाद नेमा जी की मंगोड़ी,और सार्थक के घर गपशप ट्रेन में आँख बन्द करते ही याद आने लगती हे।
                                  यह सब बहुत सुखद अनुभवो की मीठी यादे हे जो ज़िन्दगी के सेविंग्स एकाउंट में फिक्स डिपाजिट होती जाती हे पर सच्चाई यही हे कही पहुँचने के लिए कही से निकलना पड़ता हे...एक बार फिर जन्म भूमि से कर्म भूमि की ओर,कुछ हासिल करने और  मन में इस भरोसे के साथ की जब अगली बार सब दोस्त मलखान पर  साथ बैठेंगे तो सबके पास अपनी नयी कामयाबियों के ढेरो किस्से होंगे सुनाने के लिये। राह के पत्थर से ज़्यादा कुछ नही मंज़िले,रास्ते आवाज़ देते हे सफर जारी रखो...

मिलते हे :)

Friday, 6 May 2016

मुझे संघर्ष से प्यार हे

कभी धूप हे,कभी छाँव हे
मुझे संघर्ष से प्यार हे

कभी अविरल धार हे
कहीं पत्थरों से टकराव हे

पड़ाव पड़ाव राह में दरार हे
मुझे हर चुनोति स्वीकार हे

मुझे संघर्ष से प्यार हे...

दरिया में उतरा हूँ सामने सैलाब हे
फ़िक्र नही डूबने की मुझे खुद पर विश्वास हे

जंग लग गई हथियारों में
मेरी कलम में धार हे

मुझे संघर्ष से प्यार हे...

गली गली मचा शोर हे हार का
मुझे जीत का इन्तजार हे

सुखी पड़ी हे धरा वीरों की
यहां बारिश की दरकरार हे

मुझे संघर्ष से प्यार हे...

ख़्वाब टुटा था रात के अंधेरो में कहीं
ये आँख अब तक लाल हे

लालिमा छाई हे नयी नयी
पूरी सुबह होने का इंतज़ार हे

मुझे संघर्ष से प्यार हे...

मंज़िल दूर हे आँखों से
मुझे रास्तो पर ऐतबार हे

रुकुंगा नही छितिज तक में
मेरी ज़िद ही चुनोतियों की हार हे

मुझे संघर्ष से प्यार हे...
मुझे संघर्ष से प्यार हे...

#VCवासु