12062 जबलपुर-हबीबगंज जनशताब्दी एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय से 15 मिनिट देरी से चल रही हे आपको हुई असुविधा के लिए हमे खेद हे... 3 दिन करेली में बिताकर कल रात को बैग जमाते हुए कुछ और यादे भी बेग में ठूस ली,रोहित भैया की शादी में नरसिंहपुर और गाडरवारा के साथियो से मुलाकत,लगभग 3 साल बाद संस्कारधानी में शॉपिंग साथ ही जबलपुर की हैदराबादी बिरयानी।घर आओ तो शाम का इंतज़ार बेसब्री से रहता हे, और हो भी क्यों ना शाम का समय ही तो होता हे जब दो बेहद अज़ीज़ मित्रो से मुलाक़ात होती हे असफाक और समीर,सालो से चली आ रही दोनों की आपसी नोकझोंक मे कब लाल सूरज ढल जाता हे और चाँद अपनी चांदनी समेटे हुए निकाल आता हे पता ही नही चलता और इसी बीच आग में घी डालने के लिए हमारे अंचल भाई हो तो समझ लीजिये सोने पर प्लैटिनम।मलखान के चाय के टपरे पर ठंडी लोहे की बेंच पर बैठकर गरमा-गर्म चाय का मज़ा ही कुछ और होता हे चाय की हर चुस्की के साथ किसी ना किसी दोस्त की याद जुडी हुई होती हे जो मुस्कान बनकर चेहरे पर खिल उठती हे,चाय के बाद नेमा जी की मंगोड़ी,और सार्थक के घर गपशप ट्रेन में आँख बन्द करते ही याद आने लगती हे।
यह सब बहुत सुखद अनुभवो की मीठी यादे हे जो ज़िन्दगी के सेविंग्स एकाउंट में फिक्स डिपाजिट होती जाती हे पर सच्चाई यही हे कही पहुँचने के लिए कही से निकलना पड़ता हे...एक बार फिर जन्म भूमि से कर्म भूमि की ओर,कुछ हासिल करने और मन में इस भरोसे के साथ की जब अगली बार सब दोस्त मलखान पर साथ बैठेंगे तो सबके पास अपनी नयी कामयाबियों के ढेरो किस्से होंगे सुनाने के लिये। राह के पत्थर से ज़्यादा कुछ नही मंज़िले,रास्ते आवाज़ देते हे सफर जारी रखो...
मिलते हे :)